Posted: August 16, 2012 in Uncategorized

shrivastavgaurav

 या मौला मिली है तेरी बहुत मेहरबानी
जब भी कभी सामने थी मुसीबत
तेरा हाथ अपने सर पे मैंने है पाया ||
 
गर्दिश के बदल छाए   जब भी मुझपे
तेरी नीली छत्री   ने मुझको बचाया ||
 
यह क्या हो रहा हा ,यह क्यों हो रहा है ,
मेरे ख्यालों की गुथी को तुने सुलझाया ||
 
दिल चाहता था जाने को एक ओर, कोशिश बहुत की, ज़बज़स्त था वोह मेरा परिश्रम ,
कुछ पलों के लिए यह लगा मुझे की , इस जतोजहद का नहीं कोई फायदा है ,
वोह अरमा , वोह सपने, वोह ख्वाइश , वोह चाहत, रह गयी थे   अधूरे , नहीं होंगे पूरे ,
इस सूच में मैं बावला सा हुआ था,कोसा था त्हुज्को, मैं दुखी भी हुआ था,
लगा था की मनो मेरी प्रार्थना को तुने रुसवा किया है  ||
 
मेरी सोच   की भूल थी भी तो ऐसी,
की तेरी कृपा पे ही मैं  जो शुक कर…

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